Classical Dance, भारत अपनी सांस्कृतिक विविधता, समृद्ध परंपराओं और कलाओं के लिए विश्व प्रसिद्ध है। भारतीय शास्त्रीय नृत्य और मार्शल आर्ट्स इस सांस्कृतिक खजाने के दो अनमोल रत्न हैं। ये न केवल कला के माध्यम से आध्यात्मिक और भावनात्मक अभिव्यक्ति के साधन हैं, बल्कि ऐतिहासिक, सामाजिक और धार्मिक आयामों से भी गहराई से जुड़े हुए हैं। इस ब्लॉग पोस्ट में हम भारतीय शास्त्रीय नृत्यों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, उनकी विशेषताएं, प्रमुख रूप, और उनके महत्व पर विस्तार से चर्चा करेंगे।
भारतीय Classical Dance श की ऐतिहासिकता और महत्व
भारतीय शास्त्रीय नृत्य का आधार प्राचीन ग्रंथ नाट्यशास्त्र है, जिसे महर्षि भरतमुनि ने लिखा था। इसे ‘पाँचवां वेद’ भी कहा जाता है। नाट्यशास्त्र न केवल नृत्य की तकनीकों, मुद्राओं, भावों, और रंगमंच की विस्तृत व्याख्या करता है, बल्कि इसमें श्रोता और दर्शकों के प्रभाव का भी समावेश है।
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद से लिए गए तत्वों का समन्वय नृत्य, नाटक और संगीत का एक संपूर्ण अनुभव प्रदान करता है।

भीमबेटका की गुफाओं में पाए गए सामुदायिक नृत्यों का चित्रण और हड़प्पा सभ्यता की नृत्य करती महिलाओं की मूर्तियां इस कला की प्राचीनता और सामाजिक महत्व को दर्शाती हैं। विभिन्न राजवंशों ने नृत्य को संरक्षण दिया और मंदिरों तथा राजदरबारों में इसका विकास हुआ।
Classical Dance के प्रमुख रूप और उनकी विशेषताएं
नाट्यशास्त्र के अनुसार नृत्य के दो मुख्य रूप हैं: तांडव और लास्य। तांडव में पुरुषत्व, शक्ति और गति का प्रदर्शन होता है जबकि लास्य में स्त्रीत्व, सौंदर्य और भावुकता प्रमुख होती है। नृत्य के माध्यम से रसों और भावों की अभिव्यक्ति की जाती है, जिनमें प्रमुख हैं – श्रृंगार (प्रेम), रौद्र (क्रोध), वीर (साहस), करुण (दुःख), हास्य (हँसी), भयानक (डर), आदि।
मुद्राओं का विशेष महत्व है, जिनकी संख्या 108 मानी जाती है। ये हाथ और शरीर की मुद्राएं भावों को प्रकट करती हैं, जिससे दर्शक भावों को समझ पाते हैं।
प्रमुख Classical Dance का परिचय
भरतनाट्यम (तमिलनाडु)
भरतनाट्यम भारत का सबसे पुराना Classical Dance के रूप में जाना जाता है। इसका जन्म मंदिरों में देवताओं की स्तुति के रूप में हुआ। इसमें मुद्राओं, भावों, और कथात्मक प्रस्तुतियों का अनूठा संयोजन होता है। इसका प्रदर्शन तांडव और लास्य दोनों तत्वों का मिश्रण होता है। तंजावुर के चार महान गुरु ‘तंजौर चौकड़ी’ ने इसे समृद्ध किया।
भरतनाट्यम में कथानक को संगीत, ताल, और राग के साथ प्रस्तुत किया जाता है। इसके चरण हैं – अलारिप्पु, जानतारवरम, शब्बदम, वणिम, पदम, जवाबी, और नतलिसा, जिनका क्रमिक प्रदर्शन नृत्य की गहराई को दर्शाता है।
कुचिपुडी (आंध्र प्रदेश)
कुचिपुडी नृत्य शैलि को 17वीं सदी में सुदृढ़ किया गया। यह वैष्णव मंदिरों से जुड़ा हुआ है और भगवत पुराण की कथाओं पर आधारित होता है। श्रृंगार रस कुचिपुडी की विशेषता है। इसमें नर्तक और नर्तकी दोनों अभिनय करते हैं और गीत गाते भी हैं। कुचिपुडी में मांडुक शब्द, तरांगम, और जलचर नृत्य जैसे एकल तत्व भी होते हैं जो इसे विशिष्ट बनाते हैं।
कथकली (केरल)
कथकली एक नाट्यात्मक नृत्य-नाटक है, जिसमें रामायण और महाभारत के प्रसंगों का चित्रण होता है। इसमें मुखौटे, रंग-बिरंगे वस्त्र, और विस्तृत श्रृंगार का प्रयोग होता है। रंगों से पात्रों के स्वभाव और भावों का संकेत मिलता है, जैसे हरा रंग पवित्रता, लाल रंग क्रोध, और काला रंग दुष्टता का प्रतीक है। कथकली में संगीत, गायन, और नृत्य का सुंदर समन्वय होता है, जो दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देता है।
मोहिनीअट्टम (केरल)
मोहिनीअट्टम मुख्यतः स्त्रियों द्वारा किया जाने वाला नृत्य है, जिसमें भरतनाट्यम की भव्यता और कथकली की अभिव्यक्ति का मेल होता है। यह नृत्य विष्णु के मोहिनी अवतार की कथा प्रस्तुत करता है। इसमें सफ़ेद रंग की पोशाक और सुनहरे जरीदार काम का विशेष महत्व है। मोहिनीअट्टम की मुद्राएं सौम्य और भावपूर्ण होती हैं।
ओडिसी (ओडिशा)
ओडिसी भारतीय शास्त्रीय नृत्यों में अत्यंत पुराना और प्रसिद्ध नृत्य है। इसका उल्लेख नाट्यशास्त्र में ‘ओडरा नृत्य’ के रूप में मिलता है। ओडिसी त्रिभंग मुद्रा, चौक मुद्रा और विशिष्ट हस्त मुद्राओं का उपयोग करता है। यह नृत्य मंदिरों में भगवान जगन्नाथ की स्तुति में विकसित हुआ। ओडिसी में मांगलिक अनुष्ठान, भावात्मक प्रस्तुति और शुद्ध तकनीक का संगम होता है।
मणिपुरी (मणिपुर)
मणिपुरी नृत्य असम के वैष्णव संत शंकरदेव द्वारा प्रेरित है। यह नृत्य कृष्ण की लीलाओं, विशेषकर रास लीला पर आधारित है। इसमें स्त्रियाँ पारंपरिक साड़ी और श्रृंगार पहनकर प्रदर्शन करती हैं। मणिपुरी में तांडव और लास्य दोनों तत्व शामिल होते हैं। इसकी विशिष्टता धीमे, सौम्य और लयबद्ध आंदोलनों में है।
कथक ( उत्तर प्रदेश)
कथक शास्त्रीय नृत्य का एक प्रमुख रूप है, जिसकी उत्पत्ति ब्रजभूमि की रास लीला से हुई। इसमें फ़ारसी प्रभाव भी देखा जाता है, जो मुग़ल दरबार के दौर में आया। कथक की विशेषता तेज़ चक्कर, जुगलबंदी (नर्तक और तबला वादक के बीच संवाद), और भावपूर्ण कहानी कहने की कला है। यह नृत्य ध्रुपद और ठुमरी संगीत के साथ किया जाता है।
Classical Dance का सांस्कृतिक महत्व
भारतीय शास्त्रीय नृत्य हमारी सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा हैं। नृत्य के माध्यम से हम अपनी भावनाओं, कहानियों और आध्यात्मिकता को अभिव्यक्त करते हैं, ताकि ये संस्कृति आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित और समृद्ध रूप में पहुंच सकें। भारत के विविध शास्त्रीय नृत्यो की यह समृद्ध विरासत हमें न केवल अपने अतीत से जोड़ती है, बल्कि भविष्य में भी सांस्कृतिक गौरव का स्रोत बनी रहेगी।
